सोनिया गांधी: 2004 का लोकसभा चुनाव परिणाम आ चुका था। एनडीए को बहुमत नहीं मिला था, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी भाजपा थी। सबकी नजरें एक ही व्यक्ति पर टिकी थीं – सोनिया गांधी। कांग्रेस+सहयोगियों की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) को 222 सीटें मिली थीं और वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर दिया था। यानी सरकार बनाने वाली मैडम के पास थीं।
पूरे देश में एक ही सवाल गूंज रहा था – क्या इटली में जन्मी सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनेंगी?

सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे थे। “इटली की बहू नहीं चलेगी” के नारे लग रहे थे। सुषमा स्वराज ने कहा था कि वे सिर मुंडवा लेंगी अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनीं। शरद यादव ने “विदेशी मूल” का मुद्दा जोर-शोर से उठाया।
और फिर आया वो ऐतिहासिक दिन – 18 मई 2004।# सोनिया गांधी ने कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में खड़े होकर कहा:
“मैंने हमेशा माना है कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद और प्रधानमंत्री का पद एक ही व्यक्ति के पास नहीं होना चाहिए। मेरी आंतरिक आवाज मुझे बार-बार कह रही है कि मैं प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करूंगी। मैं आप सबसे विनम्रता से अनुरोध करती हूँ कि मुझे इस जिम्मेदारी से मुक्त करें।”
पूरा हॉल स्तब्ध रह गया। राहुल गांधी फूट-फूट कर रोए। प्रणब मुखर्जी, अहमद पटेल, नटवर सिंह – सबने मनाने की कोशिश की। लेकिन सोनिया का फैसला अटल था।
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उसी शाम उन्होंने राष्ट्रपति भवन जाकर डॉ. मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया। और इस तरह भारत के इतिहास में पहली बार एक ऐसा प्रधानमंत्री बना जिसका कोई अपना राजनीतिक आधार नहीं था – सिर्फ एक व्यक्ति की कृपा थी।
#सोनिया गांधी:उस एक फैसले ने क्या-क्या बदल दिया?
18 मई 2004। शाम 7 बजकर 17 मिनट। कांग्रेस मुख्यालय में संसदीय दल की बैठक चल रही थी। सबकी सांसें थमी हुई थीं। #सोनिया गांधी खड़ी हुईं और बोलीं – “मेरी अंतरात्मा की आवाज़ मुझे बार-बार कह रही है कि मैं प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं करूंगी।”
बस यही 22 सेकंड का बयान था। लेकिन इसने भारत की राजनीति के सारे समीकरण हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिए।
उस एक फैसले ने ठीक-ठीक क्या-क्या बदल दिया?
- भाजपा का सबसे बड़ा हथियार कुंद पड़ गया “इटली में जन्मी महिला भारत की पीएम नहीं बनेगी” – ये नारा 2004 में भाजपा का सबसे तेज़ तीर था। सोनिया ने खुद ही वो तीर तोड़ दिया। उसके बाद भाजपा के पास 2009 और 2014 में भी ये मुद्दा दोबारा उतनी ताकत से नहीं चला।
- भारत को पहली बार “रिमोट कंट्रोल” वाली सरकार मिली प्रधानमंत्री बने डॉ. मनमोहन सिंह – जिन्होंने कभी लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। असली सत्ता 10 जनपथ पहुँच गई। NAC (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) के जरिए सोनिया ने मनरेगा, RTE, खाद्य सुरक्षा कानून, RTI को मजबूत रूप दिया।
- “विदेशी मूल” का मुद्दा हमेशा के लिए खत्म भाजपा के पास सबसे बड़ा हथियार था वो छिन गया। 2009 और 2014 में भी वो मुद्दा उतनी जोर से नहीं उठ सका।
- मनमोहन सिंह युग की शुरुआत एक अर्थशास्त्री, जो कभी चुनाव नहीं लड़ा, 10 साल तक प्रधानमंत्री रहा। न्यूक्लियर डील, RTI, मनरेगा, 8-9% की आर्थिक विकास दर – सब उसी दौर की देन हैं।
- सोनिया गांधी बनीं “सुपर प्रधानमंत्री” उन्होंने प्रधानमंत्री पद छोड़ा, लेकिन सत्ता नहीं। NAC (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) की अध्यक्ष बनकर उन्होंने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, RTE जैसे कानून बनवाए। मीडिया ने उन्हें “सबसे ताकतवर महिला” कहा।
- कांग्रेस के भीतर “गांधी परिवार” की स्थिति और मजबूत बलिदान की इस छवि ने सोनिया को पार्टी में लगभग “देवी” का दर्जा दे दिया। कोई भी बड़ा नेता उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
- भाजपा को नया नैरेटिव मिला 2014 में मोदी ने यही कहा – “दिल्ली में एक कमजोर प्रधानमंत्री और सत्ता का असली केंद्र कहीं और”। वो 10 साल पुराना फैसला भी चुनावी हथियार बना।
आज, 2025 में देखें तो…
उस एक फैसले ने न सिर्फ 2004-2014 की राजनीति बदली, बल्कि आज भी भारतीय राजनीति के कई समीकरण उसी से निकले हैं। राहुल गांधी आज भी उसी “बलिदान की विरासत” को आगे ले जाने की कोशिश करते दिखते हैं। भाजपा आज भी “परिवारवाद और “रिमोट कंट्रोल” की बात करती है।
एक महिला ने सिर्फ इतना कहा – “मैं प्रधानमंत्री नहीं बनूंगी” और पूरे देश की राजनीति का नक्शा बदल गया।
ये है #सोनिया गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक चाल। और शायद सबसे चतुर भी।
एक महिला ने सिर्फ इतना कहा – “मैं प्रधानमंत्री नहीं बनूंगी” और पूरे देश की राजनीति का नक्शा बदल गया।
ये है सोनिया गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक चाल। और शायद सबसे चतुर भी।
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